मै कहाँ जाऊ, मैं किधर जाऊ
बात करने को किसके घर जाऊँ
मेरे घर टीवी सुबह से चल रहा है
मेरा मुँह खोलना भी खल रहा है
घर के छोटे बड़े सब अपने फ़ोन में थे
रूम एक था, सब अलग ही जोन में थे
मैं उठा, सीधा आ गया हूँ बाजार म
और चुप खड़ा हूँ लोगों की भरमार में
लोग दीखते तो है पर मिलते नहीँ है
सब भागते ही जाते है चलते नही है
किसको देख मुस्कुराऊ, हेलो किसे कहुँ
मेरे साथ कुछ दूर तक चलो किसे कहूँ
मैं कहाँ जाऊ मैं किधर जाऊ
दो ब्बत करने को किसके घर जाऊँ
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