मजहब की दुकाने है , खुदाओ का व्यापार है अब शहर में सबसे ज्यादा इनके इश्तिहार है अब लबों पे वाइजों के ही इबादत न रही कि जुंबा पे तोहमते है जहन में बाजार है क्यु खुदा के रास्तो पे दुनिया वाली दौड़ है उसके बंदो को फरक क्या जीत है कि हार है के खुदा खामोशियो से , दे गए कुर्बानियाँ या तो तुम झूठे हो मियां या कि वो लाचार है भीड़ का न मजह्बो से, ना खुदा से वास्ता बस तमाशा देखने वालों की ये भरमार है उसको मंदिर में , मस्जिद कैद करना भूल है जर्रे जर्रे में है वो हमको कहां इनकार है साथ हो लो उसके या फिर लोगों को खुश कीजिए कि खुदा हमसे शुरू हमपे ख़तम सरकार है मजहब की दुकाने है , खुदाओ का व्यापार है अब शहर में सबसे ज्यादा इनके इश्तिहार है
बड़ी कोशिश से चला हूँ मगर यही डर है फिर लिए आएगी मुझे कोई लहर तेरी तरफ मैं न देखू तुझे ये कितनी देर मुमकिन है कि जरा देर और ये मेरी नजर तेरी तरफ मैं अपने आप को आठो पहर धकेलता हूँ इक कशिश खिचती है शामो सहर तेरी तरफ यार हर बार कही से किसी बहाने से मुड़ ही जाती है हरेक रहगुजर तेरी तरफ अक्ल कहती है किसी मंज़िल , किसी हासिल को चल दिल ये कहता है जब भी पछु किधर ,तेरी तरफ यही उलझन है कि मैं ना चलु तो जी न सकू दुनिया नाराज़ है चलता हूँ अगर तेरी तरफ बड़ी कोशिश से चला हूँ मगर यही डर है फिर लिए आएगी मुझे कोई लहर तेरी तरफ